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बंग समाज भवन में गगन चंद्र पंड्या की द्वितीय पुस्तक “बंग संस्कृति के प्रादुर्भाव एवं क्रमिक विकास” का विमोचन सम्पन्न।

आर.बी. गहरवार ने कहा राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान बंग समाज की देन है। डॉ. शिरोमणि माथुर बोले साहित्य जगत दादा का ऋणी रहेगा।

रमेश मित्तल चीफ एडिटर नवभारत news 24 छग.

दल्लीराजहरा/ स्थानीय बंग समाज भवन के सभागार में मंगलवार को साहित्यिक गरिमा के साथ एक विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस अवसर पर वरिष्ठ समाजसेवी एवं लेखक गगन चंद्र पंड्या की द्वितीय पुस्तक “बंग संस्कृति के प्रादुर्भाव एवं क्रमिक विकास संकलित” का विमोचन किया गया।

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में राजहरा लौह अयस्क समूह के मुख्य महाप्रबंधक आर.बी. गहरवार उपस्थित थे। विशेष अतिथि के रूप में वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. शिरोमणि माथुर ने शिरकत की। कार्यक्रम में अतिथियों के रूप में रेखा गहरवार अध्यक्ष महिला समाज, जय प्रकाश महाप्रबंधक, विपिन कुमार, सुकान्तो मंडल, डॉ. राज शेखर राव प्राचार्य डी.ए.वी. इस्पात सीनियर सेकेंडरी स्कूल, डॉ. शैवाल जाना, पुरोबी वर्मा, राजेन्द्र बेहरा, कनक बनर्जी, मदन मायती एवं गौतम बेरा उपस्थित थे।

कार्यक्रम का प्रारंभ मां सरस्वती की पूजा अर्चना, दीप प्रज्वलन एवं अतिथियों के स्वागत के साथ हुआ। मंच संचालन मुनमुन सिंह ने किया।

पुस्तक के बारे में जानकारी देते हुए लेखक गगन चंद्र पंड्या ने कहा कि इस पुस्तक में बंगाल के महापुरुषों के विभिन्न क्षेत्रों में दिए गए योगदान को संकलित किया गया है। यद्यपि यह विषय बंगाली भाषा के लोगों के लिए विशेष महत्व रखता है, लेकिन इसे हिंदी में लिखने का उद्देश्य यह है कि हिंदी के पाठक भी बंगाल के गौरवशाली इतिहास और संस्कृति को समझ सकें। उन्होंने बताया कि पुस्तक में बंगाल की प्राचीन महानता, बांग्ला साहित्य के विकास क्रम और बंगाल कैलेंडर का भी उल्लेख किया गया है। बंगाल कैलेंडर 493 ईस्वी में प्रारंभ हुआ था। पुस्तक में 490 ईस्वी से 900 ईस्वी तक के समय चक्र में हुए साहित्यिक विकास और उस समय के राजा ऋषामई सहित बौद्ध साहित्यकारों की रचनाओं का भी वर्णन है।

कार्यक्रम में उपस्थित अतिथियों ने अपने उद्बोधन में पुस्तक एवं लेखक की भूरि-भूरि प्रशंसा की।

मुख्य अतिथि आर.बी. गहरवार ने कहा: “गगन सर के साहित्य के प्रति लगन का सम्मान करता हूं। आज का समय इतना आगे बढ़ गया है कि जिस ज्ञान को एकत्र करने में कई वर्ष बीत जाते थे वह अब मोबाइल के बटन दबाते ही स्क्रीन पर आ जाता है। लेकिन पुस्तक के पन्नों को पलटने में जो भौतिक सुख होता है वह अलग है। पुस्तकें हमारे अस्तित्व और पहचान को बताती हैं। सही मायने में बंग संस्कृति के ज्ञान का लोहा हर समाज मानता है। राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान बंग समाज की देन है। गगन सर ने छोटी सी पुस्तक में बहुत बड़ा ज्ञान समेटा है।”

महाप्रबंधक जय प्रकाश ने कहा: “इस पुस्तक को देखकर मैं बहुत प्रभावित हुआ हूं। बचपन में अलग-अलग कक्षाओं में इनके बारे में पढ़ते थे। यह संकलन काफी विशेष स्थान रखता है। इस तरह की पुस्तक आपको कहीं पुस्तक की दुकानों में नहीं मिलेगी। आने वाली पीढ़ी जरूर इससे लाभान्वित होगी। इन पुस्तकों में महान संत, महान वैज्ञानिक, महान दार्शनिक, महान समाज सुधारक, महान क्रांतिवीरों और महान राजनीतिज्ञों का चर्चा की गई है। गागर में सागर है यह पुस्तक।”

विशेष अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. शिरोमणि माथुर ने कहा: “मेरी दृष्टिकोण से यह पुस्तक काफी उपयोगी साबित होगी। दादा भले ही बोलते हों कि वह लेखक नहीं हैं लेकिन वह साहित्य गगन के सितारे हैं। हमारे देश हमारी संस्कृति को पूरा विश्व पटल तक ले जाने में बंगाली संस्कृति का जो योगदान है उसकी हम हमेशा ऋणी रहेंगे। हम स्वामी विवेकानंद जी को नहीं भूल सकते, नहीं हम गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर को नहीं भूल सकते। दादा ने जो काम किया है वह बहुत ही असाधारण है। साहित्य जगत आपका ऋणी रहेगा।”

विपिन कुमार ने कहा: “सर का यह पुस्तक भारतीय संस्कृति को जोड़ने वाला पुस्तक है। आज इस अवस्था में सर ने जो तनमयता के साथ लगे रहते हैं। जब ईश्वरीय शक्ति और ईश्वरी ज्ञान मिलता है तब कोई व्यक्ति लिख पाता है। यह पुस्तक सिर्फ बंगाली समाज के प्रनेताओं का ही नहीं यह भारतीय संस्कृति को जोड़ने वाला पुस्तक है। सर ने कई सारे ग्रंथों का अध्ययन कर इस किताब में समाहित किया है।”

डी.ए.वी. इस्पात स्कूल के प्राचार्य जी.वी. राजशेखर राव ने कहा: “पुस्तक हम दो तरीकों से लिखते और पढ़ते हैं। ऑब्जेक्टिव माइंड और सब्जेक्टिव माइंड। किसी की भी कल्पना उसके विचारों की कोई सीमा नहीं होती।”

पुरोबी वर्मा ने कहा: “बहुत ही उपयोगी होगा यह पुस्तक। लेखन के लिए शांत वातावरण चाहिए, मन स्थिर हो और धैर्य हो तभी लेखन का कार्य कर सकते हैं। एक महापुरुष को लेकर क्रमबद्ध तरीके से लिखना वास्तव में बहुत बड़ी बात है। यह एक ऐसा पुस्तक है जिसमें आपको बंगला संस्कृति के बारे में सभी जानकारी मिल जाएगी।”

कार्यक्रम के अंत में आभार व्यक्त कनक बनर्जी ने किया।

Ramesh Mittal

Chief Editor, navabharatnews24.com

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